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जौनपुर कि मूली विश्व भर मैं अजूबा

mooli मूली की नेवार प्रजाति जो कभी जौनपुर कि शान रही थी आज तलाशने पे भी नहीं मिलती. नेवार के नाम से मशहूर मूली का अब अता-पता नहीं .शहरीकरण जौनपुर की पहचान रही इस प्रजाति को निगल गया .यह मूली अपने बड़े अकार और मीठे स्वाद के लिए मशहूर थी. आप को जान के आश्चर्य होगा कि  यहाँ की मूली छह से सात फीट लंबी व ढाई फीट मोटी होती थी. इस मूली को जौनपुर की सीमा से लगे आधा दर्जन गांवों में उगाया जाता था. इन सभी गांवों के करीब से गोमती नदी बहती है. लिहाजा सिंचाई के भरपूर साधन रहे हैं. अपनी भौगोलिक परिस्थिति और खास किस्म की मिट्टी के चलते नेवार प्जाति की मूली जौनपुर में ही होती है.

 

 

मूली की इस नेवार प्रजाति को बचाने की हर हाल में कोशिश की जानी चाहिए.

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शिराज़-ए-हिंद जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती

imartee जौनपुर जो “शिराज़-ए-हिंद” के नाम से भी मशहूर हैं, भारत के उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। मध्यकाल में शर्की शासकों की राजधानी रहा जौनपुर  गोमती नदी के दोनों तरफ़ फैला हुआ है। कभी यह  अपने इत्र और सुगंधित चमेली के तेलों के लिए मशहूर था लेकिन आज वहाँ इत्र तो कभी कभार दिख जाता है लेकिन चमेली का  तेल तलाशना मुश्किल हो जाता है.

लेकिन जौनपुर शहर की हरे उड़द, देशी चीनी और देशी घी से लकड़ी की आंच पर बनी लजीज ‘इमरती’ अब भी देश-विदेश में धूम मचा रही है. शहर के ओलन्दगंज के नक्खास मुहल्ले मैं  बेनीराम कि दूकान वाली इमारती कि बात हे और है. बेनीराम देवी प्रसाद ने सन 1855 से अपनी दुकान पर देशी घी की ‘इमरती’ बनाना शुरू किया था.उस गुलामी के दौर मैं भी  बेनीराम देवीप्रसाद कि  इमरती सर्वश्रेष्ट मणि जाती थी. उसके बाद बेनी राम देवी प्रसाद के  उनके लड़के बैजनाथ प्रसाद, सीताराम व पुरषोत्तम दास ने  जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती की महक तक बनाए रखी .अब जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती को बेनीराम देवी प्रसाद की चौथी पीढ़ी के वंशजों रवीन्द्रनाथ, गोविन्, धर्मवीर एवं विशाल ने पूरी तरह से संभाल लिया है और इसे विदेश भी भेजा जाने लगा है.  जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती आज तकरीबन 153 वर्ष पुरानी हो चुकी है और उसका स्वाद और गुणवत्ता अभी भी बरकरार है.

जब कभी आप जौनपुर आयें तो ओलन्दगंज से ताज़ी इमारती का स्वाद चखना ना भूले जबकि इसे १० दिन तक बिना फ्रिज के ताज़ा रखा जा सकता है लेकिन ताज़ी नर्म  इमारती कि बात ही और हैं.

औड़िहार से पहली पैसेंजर गाड़ी रविवार २० फरवरी २०११ को

औड़िहार से  पहली पैसेंजर गाड़ी रविवार २०  फरवरी  २०११  को जंक्शन (भंडारी) के प्लेटफार्म नंबर पांच पर सुबह 8 बजकर 50 मिनट पर सीटी बजाती पहुंची.

औड़िहार-जौनपुर के बीच आमान परिवर्तन के बाद यह पहली पैसेंजर ट्रेन चलायी गयी है. दुधौड़ा, डोभी, केराकत, मुफ्तीगंज तथा यादवेंद्र नगर के अलावा अन्य हाल्ट स्टेशनों पर रुकती हुई यह जंक्शन पर पहुंची

केराकत से जौनपुर तक की ३० किलोमीटर की दूरी महज चार रुपये किराया देकर तय होने से गरीब तबके के लोग भी खुश हैं.यह ट्रेन शाम ६.१० पर जौनपुर से फिर औड़िहार के लिए रवाना होगी.

जौनपुर -भौगोलि‍क संरचना

जौनपुर -भौगोलि‍क संरचना

station जनपद जौनपुर वाराणसी मण्‍डल के उत्‍तरी- पश्‍चि‍मी भाग में स्‍थि‍त है। इसका भू-भाग 25.24 और 26.12 के उत्‍तरी अक्षांश तथा 82.7 और 83.5 पूर्वी देशान्‍तर के मध्‍य में है। यह समुद्र सतह से 261-290 फीट की उचॉई पर बसा हुआ है। जनपद का समपूर्ण भू-भाग समतल है, केवल नदि‍यों की घाटि‍यों का भू-भाग असमतल है। गोमती एवं सई यहॉ की प्रमुख एवं अनवरत बहने वाली नदि‍यॉ है। इसके अति‍रि‍क्‍त वरूणा, बसुही, पीली, मामुर एवं गांगी यहॉ की छोटी नदि‍यॉ है। गोमती एवं बसुही जनपद को लगभग 4 समानान्‍तर भू-खण्‍डों में वि‍भक्‍त करती है। बलुई, दोमट, उसर तथा मटि‍यार मुख्‍यत: भूमि‍ है। बाढ ग्रस्‍तता की आपदा से प्राय: जनपद प्रभावि‍त रहता है।

खनि‍ज पदार्थो का अभाव है। खुदाई करने पर कही-कही कंकड उपलब्‍ध होता है, जि‍से जलाकर चूना बनाया जाता है। बालू एवं कंकड से प्राप्‍त चूना भवन र्नि‍माण के काम में आता है।

जनपद का न्‍यूनतम तापक्रम 5.8 एवं उच्‍चतम तापक्रम 46.5 सेंटीग्रेड के मध्‍य रहता है। औसत सामान्‍य वर्षा 987 मि‍मी है। जनपद में 21 वि‍कास खण्‍ड तथा 6 तहसीलें है।

जनपद का भौगोलि‍क क्षेत्रफल 4021 वर्ग कि‍मी है। जनपद का आर्थि‍क वि‍कास मुख्‍य रूप से कृषि‍ पर आधारि‍त है। इसका मुख्‍य कारण जनपदjaunpurstn में भारी उद्योग का न होना है। वाराणसी- जौनपुर मार्ग पर कई उद्योग खुल रहे है। करंजाकला के पास एक सूती मि‍ल चालू है। सतहरि‍या में भी पेप्‍सी, हॉकि‍न्‍स एवं कुछ उद्योग लगे हुए है। पशुपालन के आधार पर एक डेरी उद्योग अलीगंज में स्‍थापि‍त कि‍या गया है। जनपद की 3/4 जनसंख्‍या कृषि‍ पर आधारि‍त है।

सन् 2001 की जनसंख्‍या के अनुसार जनपद की कुल जनसंख्‍या 39,11,305 है, जि‍समें महि‍लाओं की जनसंख्‍या 19,75,729 है तथा पुरूषों की जनसंख्‍या 19,35,576 है। इस प्रकार से स्‍त्री पुरूष का अनुपात 1:1.02 का है। महि‍लाओं की जनसंख्‍या की दृष्‍टि‍कोण से इसे एक वि‍कसि‍त जनपद कहा जा सकता है, क्‍योंकि‍ प्रति‍ हजार पुरूषों पर स्‍त्रि‍यों की संख्‍या 1020 है।

प्रशासनि‍क दृष्‍टि‍कोण से जनपद की कानून व्‍यवस्‍था बनाये रखने तथा वि‍कास कार्यो को ठीक ढंग से लागू कराने के लि‍ये जनपद को छह तहसीलों सदर, मड़ि‍याहूं, मछलीशहर, केराकत, शाहगंज तथा बदलापुर में बॉटा गया है। इसी प्रकार जनपद को 27 वि‍कास खण्‍ड़ो, में वि‍भाजि‍त कि‍या गया है। कानून व्‍यवस्‍था की दृष्‍टि‍ से जनपद को 27 थानों में वि‍भाजि‍त कि‍या गया है.

महत्त्वपूर्ण सड़क और रेल जंक्शन युक्त जौनपुर एक कृषि बाज़ार है और यहाँ के आधे से अधिक क्षेत्र में बाग़वानी की जाती है। शहर के आसपास के लगभग समूचे जलोढ़ मैदान में खेती की जाती है और इसके अधिकांश हिस्से की सिंचाई की जाती है। फ़सलों में धान, मक्का, जौ और गन्ना शामिल है। बाढ़ और सूखे से इस क्षेत्र को बहुत नुक़सान पहुँचा है

जौनपुर ब्लोगर्स मैं आप सब का स्वागत है.

800px-Jaunpurbridge जौनपुर ब्लोगर्स बनाने का निश्चय एक ऐसे समय मैं लिया गया जब की साझा ब्लॉग मैं झगड़ों को ले के पूरा ब्लॉगजगत चिंतित है. लेकिन यह ब्लॉग और साझा ब्लॉग से थोडा सा हट के है. यहाँ आने वाले हर एक मेम्बर से यह आशा की जाती हैं की वो इसको अपना ब्लॉग समझेगा और यहाँ अपने गाँव,घर ,वतन की यादें हम सब के साथ बाटेंगा. इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं वो किसी और विषय पे नहीं लिख सकता   लेकिन इस ब्लॉग का सबसे बड़ा मकसद सभी मेम्बर को मालूम होना चाहिए. वतन से दूर वतन की यादें ज़रा कुछ अधिक ही आया करती हैं. परदेस मैं कहीं कोई  जब अपने देस का मिल जाता है तो कितनी ख़ुशी होती है यह मुझ जैसा एक परदेसी ही बता सकता है.  यही वतन की मुहब्बत मुझे जौनपुर ब्लोगर  तक खींच लाई.

महावीर शर्मा जी की कुछ पंकियां याद आ रही हैं की
जब वतन छोड़ा, सभी अपने पराए हो गए
आंधी कुछ ऐसी चली नक़्शे क़दम भी खो गए
खो गई वो सौंधि सौंधी देश की मिट्टी कहां ?
वो शबे-महताब दरिया के किनारे खो गए




वतन से दूर वतन की बातें करने और सुनने का मज़ा ही कुछ और हैं. मेरा सभी मेम्बेर्स से अनुरोध है की जो भी लिखें वो जौनपुर ब्लोगर के लिए ही लिखें. एक ही समय मैं कोई पोस्ट यहाँ भी और दूसरे ब्लॉग पे भी एक साथ ना डालें.
इस ब्लॉग मैं जिस किसी को भी आना है उसके लिए पयाम ए मुहब्बत और वतन की धरती से प्रेम आवश्यक है. यहाँ ना कोई पद है और  कोई बड़ा ना छोटा. सबके अधिकार बराबर के हैं और आशा करता हूँ की सभी इस को अपना ब्लॉग समझते हुए अपने लेख़ और कविताएँ पोस्ट करेंगे.
www.jaunpurcity.in

जौनपुर शिराज़ ए हिंद भाग १

जौनपुर ब्लोगेर्स और अमन का पैग़ाम की आवाज़ अर्चना चावजी को सुनें जौनपुर का इतिहास.

जौनपुर जो शिराज़हिंद के नाम से भी मशहूर हैं, भारत के उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। मध्यकाल में शर्की शासकों की राजधानी रहा जौनपुर वाराणसी (भूतपूर्व बनारस) से 58 किमी. दूर है और यह  गोमती नदी के दोनों तरफ़ फैला हुआ है। गुप्तकालीन मंदिर भी यहाँ पे पाए जाते हैं तथा  गुप्त मुद्राओं के  संग्रह के मिलने की  खबरें भी मिल चुकी हैं, जिस से ऐसा लगता है की गुप्तकाल में यह नगर व्यापार का केंद्र रहा होगा. ऐसा भी मना जाता है की जौनपुर की स्थापना सम्भवतः 11वीं शताब्दी में हुई थी, लेकिन गोमती नदी की बाढ़ से यह नष्ट हो गया . फिर से 1359 में फिरोज शाह तुगलक ने अपने चचेरे भाई सुल्तान मुहम्मद की याद में इसकी स्थापना की थी.सुल्तान मुहम्मद का वास्तविक नाम जौना खां था। इसी कारण इस शहर का नाम जौनपुर रखा गया। फिरोज शाह तुगलक का क़िला अब भी यहाँ पर मौजूद है.
fortjaunour 1394 के आसपास मलिक सरवर ने जौनपुर को शर्की साम्राज्य के रूप में स्थापित किया और यह शर्क़ी वंश (1394-1479) के स्वतंत्र राज्य की राजधानी भी रहा है.
चलिए आज आप को जौनपुर के किले की सैर करवाता हूँ :
जौनपुर शहर में गोमती तट पर स्‍थि‍त इस दुर्ग का र्नि‍माण फि‍रोज शाह ने 1362 में कराया था। इस दुर्ग के भीतरी फाटक 26.5 फीट उंचा तथा 16 फीट चौड़ा है। केन्‍द्रीय फाटक 36 फीट उंचा है। इसके उपर एक वि‍शाल गुम्‍बद बना है। वर्तमान में इसका पूर्वी द्वार तथा अन्‍दर की तरफ मेहराबे आदि‍ ही बची है, जो इसकी भव्‍यता की गाथा कहती है। इसके सामने के शानदार फाटक को मुनीम खां ने सुरक्षा की दृष्‍टि‍ से बनवाया था तथा इसे नीले एवं पीले पत्‍थरों से सजाया गया था। अन्‍दर तुर्की शैली का हमाम एवं एक मस्‍जि‍द भी है। इस दुर्ग से गोमती नदी एवं नगर का मनोहर दृश्‍य दि‍खायी देता है। इब्राहि‍म बरबक द्वारा बनवाई गई मस्‍जि‍द की बनावट में हि‍न्‍दु एवं बौद्ध शि‍ल्‍प कला की छाप है.
मध्य काल के दौरान जौनपुर, उत्तर प्रदेश में निर्मित किला अपनें आप में विषेश था,  इसके रमणीय स्वरूप की विश्च भर सरहना हुई और आगे हुये निर्माणों के लिये यह आर्दश स्वरूप बन गया। भले आज के दौर में यह जीर्ण-शीर्ण है, पर एक समय बहुत ही नई, साफ सुथरी और सराहनीय उत्कृष्ट छवियों का प्रतीक था. पुराने वैभवपूर्ण, गौरवपूर्ण उत्तरी दरवाजे आज भी अन्य जगहों पर फैले हुये हैं.
Jaunpur Fort Intro
Jaunpur Fort
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